अनकहा रिश्ता

  • वो आख़िरी स्टेशन

    स्टेशन वही था भीड़ वही, आवाज़ें वही। बस एक चेहरा नहीं था… जो हर बार मुझे छोड़ने आता था। मैंने टिकट लिया, बेंच पर बैठा, और सामने देखा वो कोना जहाँ वो हमेशा खड़ा होता था, हाथ हिलाता था, मुस्कुराता था… और कहता था, “जल्दी लौट आना।” इस बार कोई नहीं था। सिर्फ एक पुरानी…

  • नाम नहीं था उस रिश्ते का

    वो रोज़ आती थी उसी वक़्त, उसी मोड़ पर। मैं भी वहीं होता था बस यूँ ही, बिना वजह। ना उसने कभी कुछ कहा, ना मैंने कभी कुछ पूछा। बस एक खामोशी थी जो हर दिन थोड़ी और गहरी होती जाती थी। कभी-कभी उसकी आँखें कुछ कहती थीं, जैसे कोई अधूरी बात… जो लफ़्ज़ों में…