वो आख़िरी स्टेशन
स्टेशन वही था भीड़ वही, आवाज़ें वही। बस एक चेहरा नहीं था… जो हर बार मुझे छोड़ने आता था।
मैंने टिकट लिया, बेंच पर बैठा, और सामने देखा वो कोना जहाँ वो हमेशा खड़ा होता था, हाथ हिलाता था, मुस्कुराता था… और कहता था, “जल्दी लौट आना।”
इस बार कोई नहीं था। सिर्फ एक पुरानी चिट्ठी जेब में थी
जिसे मैंने कभी भेजी नहीं थी।
उसमें लिखा था “आपके बिना ये सफ़र अधूरा लगता है।”
ट्रेन आई, लोग चढ़े, शोर बढ़ा। मैं चुपचाप खड़ा रहा जैसे उस कोने से कोई आवाज़ फिर आएगी।
लेकिन वो आख़िरी स्टेशन… अब सिर्फ यादों का ठिकाना रह गया है।
