माँ की वो चुप्पी

माँ की वो चुप्पी

घर में सब कुछ वैसा ही था दीवारें, तस्वीरें, और वो पुराना रेडियो। बस माँ की आवाज़ नहीं थी।

रसोई में हल्की सी हलचल थी, लेकिन उसमें वो अपनापन नहीं था। वो जो हर सुबह चाय के साथ मिल जाता था एक नज़र, एक सवाल, एक शिकायत।

अब कुछ नहीं था। सिर्फ एक पुराना स्टील का डिब्बा रखा था टेबल पर। उसमें मेरी बचपन की चीज़ें थीं एक टूटी हुई पेंसिल, एक रिबन, और एक चिट्ठी।

चिट्ठी में लिखा था “जब तुम दूर होते हो, तो मैं खुद से भी दूर हो जाती हूँ।”

मैं चुप था। माँ भी चुप थी। लेकिन उस चुप्पी में सब कुछ था।

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