नाम नहीं था उस रिश्ते का

नाम नहीं था उस रिश्ते का

वो रोज़ आती थी उसी वक़्त, उसी मोड़ पर। मैं भी वहीं होता था बस यूँ ही, बिना वजह।

ना उसने कभी कुछ कहा, ना मैंने कभी कुछ पूछा।

बस एक खामोशी थी जो हर दिन थोड़ी और गहरी होती जाती थी।

कभी-कभी उसकी आँखें कुछ कहती थीं, जैसे कोई अधूरी बात… जो लफ़्ज़ों में नहीं ढलती।

एक दिन वो नहीं आई। मैं वहीं खड़ा रहा जैसे कोई जवाब मिल जाएगा उस ख़ामोशी से।

और फिर वो रिश्ता… जिसका कोई नाम नहीं था, वो उसी मोड़ पर छूट गया।

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