बचपन की वो आख़िरी चिट्ठी
वो लकड़ी की अलमारी आज भी वैसी ही है थोड़ी सी जंग लगी, थोड़ी सी यादों से भरी। जब माँ ने उसे खोला, तो एक पुरानी डायरी नीचे गिर पड़ी। पीले पन्नों में एक चिट्ठी दबी थी मेरी लिखी हुई, शायद दस साल पहले।

“प्यारे पापा, आप जब स्टेशन पर मुझे छोड़कर गए थे, मैंने कुछ नहीं कहा था… लेकिन बहुत कुछ कहना था।”
उस चिट्ठी में वो सब था जो मैं कभी कह नहीं पाया वो अधूरी बातें, वो गले लगने की ख्वाहिश, वो आँखों की नमी।
मैंने वो चिट्ठी फिर से पढ़ी हर शब्द जैसे दिल से निकला हो, हर लाइन जैसे एक जज़्बात की गवाही हो।
आज पापा नहीं हैं, लेकिन वो चिट्ठी है। और शायद, वही मेरी सबसे सच्ची कहानी है।
